हिन्दी लोकोक्तियाँ

लोकोक्तियां/कहावतें (Proverbs)

lokoktiyaan


'लोकोक्ति' का अर्थ है  'लोक में प्रचलित उक्ति' जब कोई कथन यह वाक्य किसी प्रसंग विशेष में लोगों के द्वारा समाज विशेष में प्रयोग किया जाने लगता है तो उसे लोकोक्ति कहते हैं इसे कहावत भी कहते हैं

  • आंख का अंधा नाम नयनसुख- गुण के विरुद्ध नाम 
  • आग लगन्ते झोपड़ा जो निकले तो लाभ- नष्ट होती हुई वस्तुओं में से जो निकले आए वह लाभ है 
  • आग लगाकर जमालो दूर खड़ी- झगड़ा लगाकर अलग हो जाना 
  • आगे नाथ न पीछे पगहा- अपना कोई न होना, घर का अकेला होना 
  • आगे कुआं पीछे खाई- हर तरफ हानि की आशंका 
  • अपनी करनी पार उतरनी- किये का फल भोगना 
  • अपना ढेंढर न देखे और दूसरों की फूली निहारे- अपना दोष न देखकर दूसरों का दोष देखना 
  • अपनी डफली अपना राग- परस्पर संगठन या मेल न खाना 
  • आप डूबे जग डूबा- जो स्वयं बुरा होता है दूसरों को भी बुरा समझता है 
  • आप भला तो जग भला- जो स्वयं अच्छे तो संसार अच्छा 
  • अपनी नाक कटे तो कटे दूसरे का सगुन तो बिगड़े- दूसरों को हानि पहुंचाने के लिए स्वयं की हानि के लिए भी तैयार रहना 
  • अब की अब के साथ जब की जब के साथ- जो सामने हो उसी की चिंता करनी चाहिए 
  • आम का आम गुठली का दाम- सब तरफ से लाभ ही लाभ 
  • अवसर चुके डोमिनी गावे ताल बेताल- समय चूकने पर किसी बात का प्रभाव नहीं पड़ता 
  • अधजल गगरी छलकत जाए- थोड़ी विद्या, धन या बल होने पर इतराना 
  • अंधों के आगे रोना अपने दीदी खोना- मूर्ख के आगे दु:खड़ा रोने बेकार है 
  • अशर्फी की लूट और कोयले पर छाप- मूल्यवान वस्तुओं को नष्ट करना और तुच्छ को सजोना 
  • ईश्वर की माया कहीं धूप कहीं छांव- कहीं सुख नहीं दुख 
  • इस हाथ दे उस हाथ ले- कर्मों का फल शीघ्र पाना 
  • ईट का जवाब पत्थर- दुष्ट के साथ दुष्टता करना 
  • इतनी-सी जान, गज भर की जबान- छोटा होने पर बढ़ चढ़कर पर बोलना 
  • उल्टा चोर कोतवाल को डांटे- अपराधी पकड़ने वाले को गलत बताएं 
  • ऊँट बहे और गदहा पूछे कितना पानी- जहां बड़े का ठिकाना नहीं वहां छोटे का क्या कहना 
  • ऊंट के मुंह में जीरा- जरूर से बहुत कम 
  • ऊंट किस करवट बैठता हैं- किसकी जीत होती है 
  • ऊंचे चड़के देखा तो घर-घर एकै का लेखा- सभी एक समान 
  • ऊंची दुकान फीका पकवान- बाहर कुछ और भीतर कुछ 
  • एक म्यान में दो तलवार- एक स्थान दो उग्र विचार वाले 
  • एक तवे की रोटी क्या छोटी क्या मोटी- किसी प्रकार का भेदभाव नहीं है 
  • एक हम्माम में सब नंगे- सहयोगी एक दूसरे की दुर्बलता जानते हैं 
  • ओछे की प्रीत बालू की भीत- नीचों का प्रेम क्षणिक 
  • कालिदास की उलटी बानी, बरसे कंबल भीगे पानी- प्रकृति विरुद्ध काम 
  • कहां राजा भोज कहां गंगू तेली- छोटे बड़े के साथ मिलान करना 
  • कहे खेत की, सुने खलिहान की- हुक्म कुछ और करना कुछ और 
  • काठ की हाँडी दूसरी बार नहीं चढ़ती- कपट का फल अच्छा नहीं होता 
  • किसी का घर जले, कोई तापे- दूसरे का दु:ख देखकर किसी दूसरे को खुशी मिलना 
  • कमरी ओढ़ने से कोई फकीर नहीं होता- ऊपरी दिखावे से दोष नहीं छुपते 
  • कर्महीन खेती करें, बैल मरे या सूखा पड़े- दुर्भाग्य होने पर सभी काम बिगड़ते हैं 
  • काजी जी दुबले क्यों शहर के अंदेशे से- अपनी चिंता न करके दूसरों की चिंता करना 
  • किस खेत का बथुआ है और किस खेत की मूली- नगण्य है 
  • कुत्तिया चोरों से मिल जाए तो पहरा कौन दे?- जब रक्षक की चोर-डाकू से साठ गांठ हो जाए तो फिर क्या चारा 
  • कुम्हार अपना ही घड़ा सराहता है- अपनी बनाई हुई वस्तु सबको अच्छी लगती है 
  • कूद-कूद मछली बगुले को खाए- पूर्णत: प्रतिकूल शाम को करना 
  • कोठी वाला रोवै छप्परा वाला सोवै- बहुत अधिक धन चिंता का कारण होता है  
  • खेत खाए गधा मार खाए जोलहा- अपराध करे कोई, दंड मिले किसी और को 
  • खरी मजूरी चोखा काम- नगद परिश्रमिक को देने से ही अच्छा काम होता है 
  • गांव का जोगी जोगड़ा, आन गांव का सिद्ध- बाहर के लोगों का सम्मान पर अपने यहां के लोगों की कदर नहीं 


 


  • गुड़ खाएं गुलगुले से परहेज- बनावटी परहेज 
  • गये थे रोजा छुड़ाने, नमाज गले पड़ी- उपकार करने के बदले स्वयं दुःख भोगना पड़ा 
  • गंगा गये  गंगादास जमुना गये जमुनादास- जिसका कोई दृढ़ सिद्धांत नहीं होता 
  • गुरु गुड़, चेला चीनी- गुरु से ज्यादा शिष्य काबिल हो  
  • गयी मांगने पूत खो आई भतार- थोड़े लाभ के चक्कर में अधिक नुकसान कर बैठना 
  • गरीबों की जोरू सब गांव की भौजाई- कमजोर से सब लाभ उठाते हैं 
  • गाँछ में कटहल ओठ में तेल- काम होने के पहले ही फल की इच्छा करना 
  • गुरु कीजौ जान, पानी पीजौ छान- अच्छी तरह से सोच समझकर कोई काम करना 
  • घड़ी में घर जले नौ घड़ी में भद्रा- हानि के समय सुअवसर-कुअवसर पर ध्यान न देना 
  • घर पर फूस नहीं नाम है धनपत- गुण कुछ भी नहीं पर गुणी कहलाना 
  • घर का भेदी लंका ढाए- आपस की फूट से हानि होती है 
  • घर की मुर्गी दाल बराबर- घर की वस्तुओं का कोई आदर नहीं करना 
  • घी का लड्डू टेढ़ा भला- लाभदायक वस्तु किसी तरह की क्यों ना हो 
  • घड़ी में घर जले अढ़ाई घड़ी मंदा- विषम परिस्थिति में बुद्धि का प्रयोग सावधानी पूर्वक करना चाहिए 
  • घर पर घोड़ा नखास मोल- घर में वस्तुओं के उपलब्ध रहने पर भी उसे मंडी से खरीदना 
  • चोर की दाढ़ी में तिनका- जो दोषी होता हैं वह खुद डरता रहता है 
  • चूहे घर में दण्ड पेलते है- बहुत अधिक अभाव होना 
  • चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए- महा कंजूस 
  • चुल्लू चुल्लू सुधेगा दुआरे हाथी बँधेगा- थोड़ा-थोड़ा इकट्ठा करके धनी होना 
  • चूहे के चाम से नगाड़े नहीं मढे जाते- तुच्छ और अल्प वस्तु से बड़ा काम नहीं हो सकता 
  • चूहे घर में दंड पेलते हैं- अत्यधिक दयनीय स्थिति 
  • चोट्टी कुत्तिया जलेबी की रखवाली- भक्षक को रक्षक का दायित्व सौपना 
  • छूँछी हाँडी बाजे टन टन- हल्के व्यक्ति के खोखलेपन का खुलासा हो जाता है 
  • जब तक सांस तब तक आस- अंतिम क्षण तक आशा बनाए रखना 
  • जब तक जीना तब तक सीना- जब तक जीवन है तब तक कोई न कोई काम धंधा करना ही पड़ता है 
  • जबरा मरे रोवै न दे- ताकतवर व्यक्ति का अत्याचार चुपचाप सहना पड़ता है 
  • जर का जोर पूरा बाकी अधूरा- रुपया सबसे बलवान है 
  • जर है तो नर नहीं तो खंडहर- रुपये से ही आदमी की इज्जत है 
  • जहां जाए भूखा वहाँ पडे सूखा- भाग्यहीन को कहीं सुख नहीं मिलता 
  • जहां रखें तवा परात वहां गुजरे सारी रात- जहां कुछ मिलने की आस होती है वहां लालची व्यक्ति ठहर जाता है 
  • जान मारे बनिया पहचान मारे चोर- बनिया और चोर परिचित को ही नुकसान पहुंचाते हैं 
  • जिसके हाथ डोई उसका सब कोई- धनी व्यक्ति के सब मित्र होते हैं 
  • जैसी बहै बयार पीठ तब तैसी दीजै डार- अवसर के अनुकूल बन जाना चाहिए 
  • झूठहि लेना झूठहि देना झूठहि भोजन झूठ चबैना- हर कार्य में बेईमानी करना 
  • झोली डारे गज फिरे मुक्ता डारे साथ- निजी संपत्ति होने पर भी दूसरों से आशा करना 
  • टके की चटाई नौ टके की विदाई- लाभ की अपेक्षा अधिक खर्च  
  • ठठेरे ठठेरे बदलौअल- चालाक को चालाक से काम पड़ना  
  • ताड़ से गिरा खजूर में अटका- एक खतरे से निकलकर दूसरे खतरे में पड़ना 
  • तीन कनौजिया, तेरह चूल्हा- जितने आदमी उतने विचार 
  • तेली का तेल जले और मशालची का सिर दुखे या छाती फटे- खर्चा किसी का हो और दुख किसी और को मालूम हो 
  • तन पर नहीं लत्ता पान खाए हैं अलबत्ता- शेखी बघारना 
  • तीन लोक से मथुरा न्यारी- निराला ढंग 
  • तुम डाल-डाल तो हम पात-पात- किसी की चाल को खूब समझते हुए चलना 
  • ताँत बजी और राग बुझी- बोलने से ही योग्यता प्रकट होती है 
  • तिरिया तेल हमीर हठ चढे न दूजी बार- प्रतिज्ञा पूरी करना, दृढ़ प्रतिज्ञा अपनी बातों से नहीं हटते 
  • तीन में न तेरह में मृंदग बजावे डेरे में- निर्द्वन्द व्यक्ति सुखी रहता है 
  • तेली खसम किया फिर भी रूखा खाया- किसी सामर्थ्यवान की शरण में रहकर भी दुख उठाना 
  • थूक कर चाटना ठीक नहीं-  दे कर लेना ठीक नहीं 
  • दमड़ी की हाँडी गई कुत्ते की जात पहचानी गयी- मामूली वस्तु में दूसरों की पहचान 
  • दमड़ी की बुलबुल नौ टका दलाली- काम साधारण, खर्च अधिक 
  • दाल भात में मूलचंद- बेकार दखल देना 
  • दुधारू गाय की दो लात भी भली- जिससे लाभ होता हो उसकी बातें भी सह लेनी चाहिए 
  • दूध का जला मट्ठा भी फूँक-फूँक कर पीता है- एक बार धोखा खा जाने पर सावधान हो जाता हैं 
  • दूर का ढोल सुहावना- दूर से कोई चीज अच्छी लगती है 
  • देसी मुर्गी, विलायती बोल- बेमेल काम करना 
  • दलाल का दिवाला क्या मस्जिद में ताला क्या?- जिसके पास कुछ है ही नहीं उसे हानि का क्या डर 
  • दाग लगाये लँगोटिया यार- अपनों से ही व्यक्ति धोखा खाता है 
  • दुनिया ठगिए मक्कर से रोटी खाइए शक्कर से- ठगी पर मौज करना 
  • दूल्हा को पत्तल नहीं बजनिये को थाल- जिसका जो हक है वह उसे न मिलकर किसी और को मिलना 
  • धोबी का कुत्ता न घर का न घाट का- निकम्मा 
  • धोबी रोवे धुलाई को, मियां रोवे कपड़े को- सभी अपने अपने नुकसान की बात करते हैं 
  • नक्कारखाने में तूती की आवाज- सुनवाई न होना 
  • न नौ मन तेल होगा, न राधा नाचेगी- न बड़ा प्रबंध होगा न काम होगा 
  • न देने को नौ बहाने- न देने के बहुत से बहाने 
  • न रहेगा बांस न बजेगी बांसुरी- झगड़े के कारण को नष्ट करना 
  • नदी में रहकर मगर से वैर- जिसके अधिकार में रहना उसी से वैर करना 
  • नाच न जाने आंगन टेढ़ा- खुद को ज्ञान नहीं सामग्री या दूसरों को दोष देना 
  • नौ की लकड़ी नब्बे खर्चे- काम साधारण, खर्च अधिक 
  • नौ नगद न तेरह उधार- अधिक उधार की अपेक्षा थोड़ा लाभ अच्छा 
  • नाम बड़े दर्शन छोटे- गुणों से अधिक बढ़ाई 
  • नीम हकीम खतरे जान- अयोग्य से हानि 
  • नंगा क्या नहायेगा, क्या निचोड़ेगा?- निर्धन से आर्थिक मदद की आशा नहीं करनी चाहिए 
  • नंगा बड़ा परमेश्वर से, नंगा खुदा से बड़ा- निर्लज्ज से सभी डरते हैं 
  • न अन्धे को न्योता देते हैं न दो जने आते- किसी विशेष काम को करने के कारण विपत्ति आना 
  • नकटा बूचा सबसे ऊंचा- निर्लज्ज सबसे बड़ा 
  • नटनी जब बांस पर चढ़ी तब घुंघट क्या?- जब बेशर्मी अपना ही ली तब लज्जा क्या? 
  • नाई के बारात में जने जने ठाकुर- जहां सभी नेता हो, जहां एक मालिक न हो
  • पराधीन सपनेहुँ सुख नाही- पराधीनता में सुख नहीं 
  • पहले भीतर तब देवता तीतर- पेट पूजा सबसे प्रधान 
  • पूछी न आछी, मैं दुलहिन की चाची- जबरदस्ती किसी के सिर पडना 
  • पराये धन पर लक्ष्मीनारायण- दूसरे का धन पाकर अधिकार जमाना 
  • पानी पीकर जात पूछना- कोई काम कर चुकने के बाद औचित्य पर विचार करना 
  • पंच परमेश्वर- पाँच पंचों की राय 
  • पत्थर को जोक नहीं लगती, पत्थर मोम नहीं होते- निर्दई व्यक्ति में दया नहीं होती 
  • पांच पंच मिले कीजै काज, हरे जीते नाही लाज- सब के सहयोग से कार्य करने पर निंदा नहीं होती 
  • फुई फुई करके तालाब भरता है, बूंद बूंद से तालाब भरता है- थोड़ा-थोड़ा करके अधिक होता है 
  • बूढ़ा वंश कबीर का उपजा पूत कमाल- श्रेष्ठ वंश में बुरे का पैदा होना 
  • बंदर क्या जाने अदरक का स्वाद- मूर्ख गुण की कद्र करना नहीं जानता 
  • बाँझ क्या जाने प्रसव की पीड़ा- जिसको दु:ख नहीं हुआ वह दुसरो का दु:ख समझ नहीं सकता 
  • बोये पेड़ बबूल का आम कहां से होय- जैसी करनी वैसी भरनी 
  • बैल का बैल गया नौ हाथ का पगहा भी गया- बहुत बड़ा घाटा 
  • बकरे की मां कब तक खैर मनायेगी- भय की जगह पर कब तक रक्षा होगी 
  • बेकार से बेगार भली- चुपचाप बैठे रहने की अपेक्षा कुछ काम करना 
  • बड़े मियां तो बड़े मियां छोटे मियां सुभान अल्लाह- बड़ा तो जैसा है, छोटा उससे बढ़कर है 
  • बाड़ ही जब खेत को खाये तो रखवाली कौन करें?- रक्षक ही जब भक्षक बन जाए तब आगे कौन हवाल? 
  • बाप न मारी मेढ़की, बेटा तीरंदाज- सामर्थ्य से अधिक बढ़ चढ़कर बातें करना
  • बिच्छू का काटा रोवे सांप का काटा सोवे- मीठी मार अधिक बुरी होती है 
  • भइ गति सांप छछूंदर केरी- दुविधा में पड़ना 
  • भैंस के आगे बीन बजावे, भैंस रही पगुराय- मूर्ख को गुण सिखाना व्यर्थ है 
  • भागते भूत की लंगोटी ही सही- जाते हुए माल में से जो मिल जाए वही बहुत है 
  • भूल गये रागरंग भूल गये छकड़ी, तीन चीज याद रही नून, तेल, लकड़ी- गृहस्थी के चक्कर में फस जाना 
  • मियां की दौड़ मस्जिद तक- किसी कार्य क्षेत्र या विचार शक्ति का सीमित होना 
  • मन चंगा तो कठौती में गंगा- ह्रदय पवित्र तो सब कुछ ठीक 
  • मुंह में राम बगल में छुरी- कपटी 
  • मान न मान मैं तेरा मेहमान- जबरदस्ती किसी के गले पड़ना 
  • मेंढक को भी जुकाम- ओछे का इतराना 
  • मार-मार कर हकीम बनाना- जबरदस्ती आगे बढ़ाना 
  • माले मुफ्त दिले बेरहम- मुफ्त मिले पैसे को खर्च करने में ममता न होना 
  • मियां बीवी राजी तो क्या करेगा काजी- जब दो व्यक्ति परस्पर किसी बात पर राजी हो तो दूसरे को इससे क्या 
  • मोहरों की लूट, कोयले पर छाप- मूल्यवान वस्तुओं को छोड़कर तुच्छ वस्तुओं पर ध्यान देना 
  • मानो तो देव, नहीं तो पत्थर- विश्वास ही फलदायक 
  • मंगनी के बैल के दांत नहीं देखे जाते- मुफ्त मिली चीज पर तर्क व्यर्थ   
  • माया तेरे तीन नाम परसू, परसा, परशुराम- धन की प्रतिष्ठा का मूल है, धनवान की सब इज्जत करते हैं 
  • मिस्सों से पेट भरता है किस्सों से नहीं- पेट को खाना चाहिए केवल बातों से पेट नहीं भरता 
  • मेढ़की को भी जुखाम हुआ है- अपनी शक्ति से बढ़कर बात करना 
  • मेरी तेरे आगे, तेरी मेरे आगे- चुगलखोरी 
  • योगी था सो उठ गया आसन रही भभूत- पुराना गौरव समाप्त हो जाना 
  • रस्सी जल गयी पर ऐंठन न गयी- बुरी हालत में पड़कर भी अभिमान न त्यागना 
  • रोग का घर खांसी, झगड़े घर हाँसी- अधिक मजाक बुरा 
  • रानी रूठेगी तो अपना सुहाग लेगी- मालिक नाराज होकर केवल नौकरी से निकाल सकता है 
  • रुपया परखे बार-बार आदमी परखे एक बार- भले भले बुरे व्यक्ति की पहचान उसके एक ही आचरण से हो जाती है 


 


  • लश्कर में ऊंट बदनाम- दोष किसी का, बदनाम किसी की 
  • लूट में चरखा नफा- मुक्त में जो हाथ लगे वही अच्छा 
  • लेना देना साढ़े बाईस- सिर्फ मोलतोल करना 
  • लिखे ईसा पढ़े मूसा- लिखावट में सुंदरता का अभाव होना 
  • सब धन बाईस पसेरी- अच्छे बुरे सबको एक समझना 
  • सत्तर चूहे खा कर बिल्ली चली हज को- कई बुरे काम कर के अंत में धर्मात्मा बनना 
  • सांप मरे पर लाठी न टूटे- अपना काम हो जाए पर कोई हानि भी न हो 
  • सीधी उंगली से घी नहीं निकलता- सीधाई से काम नहीं होता 
  • सारी रामायण सुन गये सीता किसकी जोरू- सारी बात सुने जाने पर साधारण सी बात का ज्ञान न होना 
  • सइसों का कल मुशियों की बहुतायत- पढ़े लिखो में बेकारी है 
  • सारी रात मिमियानी और एक ही बच्चा बियानी- प्रयास बहुत अधिक और लाभ कम 
  • सूरदास की काली कामरि चढ़े न दूजो रंग- आदतें पक्की होती हैं बदलती नहीं 
  • शर्म की बहू नित भूखी मरे- शर्म करने से कष्ट उठाना पड़ता है 
  • शेख़ी सेठ की धोती भाड़े की- कुछ न होने पर भी बड़प्पन दिखाना 
  • शेरों का मुंह किसने धोया?- सामर्थ वालों के लिए कोई उपाय नहीं 
  • शौकीन बुढ़िया चटाई का लहंगा- अवस्था के अनुसार आचरण न होना, अपनी इच्छा गलत ढंग से पूरी करना 
  • हाथ कंगन को आरसी क्या- प्रत्यक्ष को प्रमाण क्या 
  • हाथी चले बाजार कुत्ते भोंके हजार- उचित कार्य करने से दूसरों की निंदा की परवाह नहीं करनी चाहिए 
  • हाथी के दांत दिखाने के और खाने के और- बोलना कुछ करना कुछ 
  • हँसुए के ब्याह में खुरपे का गीत- बेमौका काम होना 
  • हंसो थे सो उड़ गये कागा भये दीवान- नीच का सम्मान, भले लोगों के स्थान पर बुरे लोगों के हाथ में अधिकार आना 
  • हांडी का एक ही चावल देखा जाता है- किसी परिवार, जाति या देश के एक ही मनुष्य को देखने से ज्ञात हो जाता है कि शेष कैसे होंगे 
  • हाथ सुमरनी बगल कतरनी- मन में कुछ और प्रत्यक्ष में कुछ और, ऊपर से निर्मल भीतर से कलुषित 
  • हाथ निकल गया पूँछ रह गयी- अधिकतम काम पूरा हो जाना 
  • हिमायती की घोड़ी ऐराकी को लात मारे- बड़े का सहारा पाकर अपने से बड़ों तथा शक्तिशाली से उलझना


मुहावरे और लोकोक्तियाँ हिन्दी 

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