लैंगिक मुद्दे, महत्वपूर्ण कानून, मुख्य बिन्दु

 लैंगिक मुद्दे (Gender issues)



लिंग समाज की दृष्टि में व्याप्त पुरुषों और स्त्रियों के बीच अन्तर है। पुरुषों को पारस्परिक रूप से समाज में सक्रिय भूमिका में दर्शाया जाता है जबकि स्त्रियों को एक शृंगार को वस्तु के रूप में अधिक दर्शाया गया है। कार्यस्थल पर लिंग आधारित मुद्दे हाल ही में श्रम बाजार में चर्चाओं का एक महत्वपूर्ण विषय बन गया है। एक सर्वाधिक प्रासंगिक मुद्दा लिंग पर आधारित भेदभाव है जिसमें किसी कार्य को करने के लिए महिलाओं की अपेक्षा पुरुषों को अधिक प्राथमिकता दी जाती है। अन्य लिंग आधारित मुद्दे भी हैं जो जीवन के विभिन्न अवसरों पर, विशेषकर कार्य स्थल में उत्पन्न होते हैं। जैसे-महिलाओं के साथ कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न, व्यावसायिक ढ़ाँचों का पुरुषों के पक्ष में सीमान्तीकरण, ये मुद्दे महिलाओं को सामाजिक, आर्थिक, व्यावसायिक एवं राजनैतिक रूप से पिछड़ा और कम उन्नति शील बनाते हैं।

श्रम बाजार में लिंग समानता को सुनिश्चित करने के लिए इन मुद्दों पर ध्यान दिये जाने की आवश्यकता है, जिसके लिए शैक्षिक तथा नीतिगत दोनों स्तर पर ठोस प्रयासों की आवश्यकता है। विचार यह है कि महिलाओं को व्यावसायिक रूप से योग्य होने के लिए उन्हें समान अवसर दिये जायें, किसी संगठन में उन्हें प्रतिष्ठित सम्मान मिले, उन्हें पुरुषों के बराबर समझा जाय, उन्हें कार्य करने तथा अपनी प्रतिभा प्रदर्शित करने के लिए समान अवसर प्रदान किये जायें। अत: व्यवसाय की सफलता के लिए लिंग आधार पर किसी व्यक्ति को काम पर रखा जाना या नौकरी से मुक्त करना नहीं किया जाना चाहिए। 

लिंग आधारित मुद्दों के लिए महत्वपूर्ण कानून (Important legislation for gender-based issues)- 

लिंग आधारित मुद्दों के लिए महत्वपूर्ण कानून निम्न हैं

(1) समान पारिश्रमिक अधिनियम 1976- इसके अन्तर्गत पुरुष और महिला कर्मचारियों को अधिनियम के अधीन संरक्षित समान या मिलते-जुलते प्रकृति के कार्य के लिए समान पारिश्रमिक का भुगतान किया जाना चाहिए। इसमें यह भी प्रावधान है कि नियोजनों को समान या मिलते-जुलते कार्य के लिए कर्मचारियों की भर्ती अथवा किन्हीं शर्तों में अथवा रोजगार की शर्तों जैसे- पदोन्नति, प्रशिक्षण में लिंग के आधार पर भेदभाव नहीं करना चाहिए।

(2) अन्तर्राष्ट्रीय श्रम संगठन (आई.एल.ओ.) भी विश्व में काम में सभी महिलाओं और पुरुषों के बीच समानता को प्रोत्साहित करने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। इसका उद्देश्य स्वतन्त्रता, समानता, सुरक्षा और मानवीय गरिमा की दशाओं में संतोषजनक और उत्पादक कार्य करने के लिए महिलाओं और पुरुषों के लिए अवसरों को बढ़ावा देना है।

(3) औद्योगिक रोजगार एक्ट 1946- यह कार्य स्थलों पर महिला कर्मचारियों के यौन उत्पीड़न के विरुद्ध सुरक्षोपायो सम्बन्धी उपबंधों से सम्बन्धित है।

लैंगिक मुद्दे के मुख्य बिन्दु (Main points of gender issue)- 

लैंगिक मुद्दे के मुख्य बिन्दु निम्नलिखित हैं

 (1) परम्पराएँ और मान्यताएँ- एक प्रमुख कारण भारतीय मान्यताओं तथा परम्पराओं का है। यहाँ जीवित पुत्र का मुख देखने से पुण्य नामक नरक से मुक्ति का वर्णन तथा श्राद्ध और पिण्डादि कार्य पुत्र के हाथ से सम्पन्न कराने की मान्यता रही है। स्त्रियों को चिता को अग्नि देने का अधिकार भी नहीं दिया गया है, जिसके कारण भी पुत्र को महत्त्व दिया जाता है और वंश को चलाने में भी पुरुष को ही प्रधान माना गया है। इन मान्यताओं तथा परम्पराओं की बेड़ियों में हमारा भारतीय जनमानस चाहे वह शिक्षित हो या अशिक्षित, पूरी तरह से आबद्ध है, जिसके परिणामस्वरूप बालकों को महत्त्व दिया जाता है और कहीं-कहीं तो बालिकाओं की गर्भ में ही हत्या कर दी जाती है। अधिकांश बालिकाओं को भी बोझ समझकर ही उनका पालन-पोषण किया जाता है तथा सदैव इन्हें पुरुषों की छत्रछाया में जीवन व्यतीत करना पड़ता है। अथर्ववेद में वर्णन आया है कि स्त्री को बाल्यकाल में पिता के अधीन, युवावस्था में पति के अधीन तथा वृद्धावस्था में पुत्र के अधीन रहना चाहिए। इस प्रकार स्त्रियों को अस्तित्व, मान्यताओं, परम्पराओं और सुरक्षा की बलि चढ़ा दिया जाता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में स्त्रियों पुरुषों की ओर ताकती हैं, तो निश्चित ही है कि पुरुष की प्रधानता स्थापित होगी। आश्चर्य तो तब होता है जब एक स्त्री स्वयं स्त्री होकर भी बालक-बालिकाओं में भेद करती है। इस प्रकार मान्यताएँ तथा परम्पराएँ लिंगीय विभेद में वृद्धि करने का प्रमुख कारण हैं।

2. संकीर्ण विचारधारा- बालक-बालिका एक ऐसा कारण है, जो लोगों की संकीर्ण विचारधारा है। लड़के माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा बनेंगे, वंश चलायेंगे, उन्हें पढ़ा-लिखाकर घर की उन्नति होगी, वहीं लड़की के पैदा होने पर शोक का माहौल होता है, क्योंकि उसके लिए दहेज देना होगा। विवाह के लिए वर ढूँढ़ना होगा और तब तक सुरक्षा प्रदान करनी होगी। उन्हें पढ़ाने-लिखाने में पैसा खर्च करना लोग बर्बादी समझते हैं। वर्तमान में बालिकाओं ने उस संकीर्ण सोच और मिथकों को तोड़ने का कार्य किया है फिर भी बालिकाओं का कार्यक्षेत्र चूल्हे-चौके तक ही सीमित माना जाता है और उनकी भागीदारी को स्वीकार नहीं किये जाने के कारण बालकों की अपेक्षा बालिकाओं का महत्त्व कम आँका जाता है, जिससे लिंगीय भेदभाव में वृद्धि होती है।

3. जागरूकता का अभाव- जागरूकता के अभाव के कारण भी लैंगिक भेदभाव उपजता है। समाज में अभी भी लैंगिक मुद्दों पर जागरूकता की कमी है, जिसके कारण बालक-बालिकाओं की देखरेख, शिक्षा तथा पोषणादि स्तरों पर भेदभाव किया जाता है। वहीं जागरूक समाज में 'बेटा-बेटी एक समान' के मंत्र का अनुसरण करते हुए बेटियों का पालन-पोषण और शिक्षा-दीक्षा बालकों की भाँति प्रदान की जाती है। जागरूकता के अभाव में माना जाता है कि स्त्रियों का कार्यक्षेत्र घर की चहारदीवारी के भीतर तक ही सीमित है। अतः उनकी शिक्षा तथा पालन-पोषण पर व्यय नहीं किया जाना चाहिए और बौद्धिक रूप में भी वे लड़कों की अपेक्षा कमजोर होती हैं। लैंगिक भेदभाव के कारण बालिकाओं के विकास का उचित प्रबन्ध नहीं किया जाता है। परिणामत: आर्थिक क्षेत्र में उनकी भागीदारी सुनिश्चित नहीं होने से उनके प्रति लोगों के नजरिये में भी परिवर्तन नहीं होता और वे सदैव स्वयं को लड़कों से हीन मान बैठती हैं। अतः बालकों को बालिकाओं की अपेक्षा अधिक महत्त्व प्रदान किया जाता है।

4. अशिक्षा- लैंगिक मुद्दों में अशिक्षा की भूमिका भी महत्त्वपूर्ण है। अशिक्षित व्यक्ति, परिवारों तथा समाजों में चले आ रहे मिथकों और अन्धविश्वासों पर ही लोग कायम रहते हैं तथा बिना सोचे-समझे उनका पालन करते रहते हैं। परिणामत: लड़के का महत्व लड़की की अपेक्षा सर्वोपरि मानते हैं। सभी वस्तुओं तथा सुविधाओं पर प्रथम अधिकार बालकों को प्रदान किया जाता है। शिक्षा के द्वारा व्यक्ति यह विचार-विमर्श करने लगा है कि लड़कों की ही भाँति लड़कियाँ प्रत्येक क्षेत्र में अग्रणी भूमिका निभा रही हैं तथा लड़का-लड़की एक समान होते हैं।

5. सरकारी उदासीनता- लिंगीय मुद्दे के बढ़ने में सरकारी उदासीनता भी एक कारक है। सरकार लिंग में भेदभाव करने वालों के साथ सख्त कार्यवाही नहीं करती है और चोरी-छुपे चिकित्सालयों और निजी क्लीनिक पर भ्रूण की जाँच तथा कन्या भ्रूणहत्या का कार्य अवाध रूप से चल रहा है। सार्वजनिक स्थलों तथा सरकारी ऑफिसों में भी महिलाओं को पुरुषों की अपेक्षा हेय दृष्टि से देखा जाता है और उनमें व्याप्त असुरक्षा के भाव को समाप्त करने की अपेक्षा उसमें वृद्धि करने का कार्य किया जाता है, जिससे लैंगिक भेदभाव में वृद्धि होती है।

6. सांस्कृतिक कुप्रथाएँ- भारतीय संस्कृति प्राचीनकाल से ही पुरुष प्रधान रही है। यद्यपि अपवादस्वरूप कुछ सशक्त स्त्रियों, विदुषियों के उदाहरण अवश्य प्राप्त होते हैं, परन्तु इतिहास साक्षी है कि सीता और द्रोपदी जैसी स्त्रियों को भी स्त्री होने का परिणाम भुगतना पड़ था। भारतीय संस्कृति में धार्मिक तथा यज्ञीय कार्यों में भी पुरुष की उपस्थिति अपरिहार्य है। और कुछ कार्यों को तो स्त्रियों को करने का निषेध है। ऐसी स्थिति में पुरुष का स्थान प्रधान हो जाता है और स्त्री का स्थान गौण।