महात्मा गांधी बेसिक शिक्षा, उद्देश्य, सिद्धांत

 महात्मा गांधी जीवन परिचय (Life Introduction)




भारत में स्वच्छ राजनीति का नेतृत्व करने वाले राष्ट्रपति महात्मा गांधी ने केवल दार्शनिक लेखक थे वरन एक महान शिक्षाविद भी थे उनकी शैक्षिक विचारधारा के मूल में भारतीय संस्कृति थी महात्मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था इनका जन्म 2 अक्टूबर सन 1869 में कालियावाड़ की एक छोटी सी रियासत पोरबंदर में एक समृद्ध परिवार में हुआ था पिता कर्मचंद एक प्रतिष्ठित वकील थे माता पुतलीबाई धार्मिक प्रवृत्ति की गृहस्थी महिला थी 13 वर्ष की आयु में गांधी जी का विवाह कस्तूरबा के साथ हुआ प्रारंभ में गांधीजी साधारण साधारण कोटि के विद्यार्थी थे सन 1887 में उन्होंने मैट्रिकुलेशन की परीक्षा पास की उसी वर्ष 4 सितंबर को उन्होंने कानून का अध्ययन करने के लिए इंग्लैंड भेजा गया इंग्लैंड में लगभग 4 वर्ष तक कानून के छात्र के रूप में रहे और 10 जून सन 1891 ईस्वी को बैरिस्टर बनकर भारत वापस आए वे काठियावाड़ तथा मुंबई में कुछ दिनों तक वकालत करते रहे किंतु इस व्यवसाय में उन्हें अधिक सफलता नहीं मिली सन 1893 में मुसलमान व्यापारी की ओर से एक मुकदमे की पैरवी करने उन्हें दक्षिण अफ्रीका जाना पड़ा यद्यपि गांधीजी वहां केवल 1 वर्ष के लिए गए थे परंतु वहां पर अपने देशवासियों की दुर्दशा और उनके साथ किए जाने वाले दुर्व्यवहार ने उन्हें इतना विचलित कर दिया कि उनकी दशा को सुधारने तथा अंग्रेजों द्वारा उन पर होने वाले अत्याचारों के विरुद्ध आवाज उठाने के लिए वहां उन्हें 20 वर्ष तक रहना पड़ा इस अवधि में उन्हें गुलामी के कष्टों और वर्ग भेद के जुल्मों का कटु अनुभव हुआ उन्हें दक्षिण अफ्रीका में रहकर स्वतंत्रता का मूल्य मालूम हुआ और वहीं पर भारत को स्वतंत्र करने का दृढ़ निश्चय किया इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने अहिंसा रूपी आध्यात्मिक अस्र को बनाए और जीवन भर इसी अस्त्र के सहारे बुराइयों और अत्याचारों के विरुद्ध लड़े



सन 1914 में स्वास्थ्य बिगड़ने के कारण भारत वापस आ गए सन 1915 में वह भारत के राजनीतिक क्षेत्र में कूद पड़े और ब्रिटिश शासन का विरोध किया सन् 1917 में उन्होंने 'साबरमती आश्रम' की स्थापना की इस आश्रम का उद्देश्य हरिजन उद्धार, ग्रामोद्योग तथा अन्य सामाजिक सुधार तथा रचना कार्य करना था सन 1921 में उन्होंने 'राष्ट्रीय शिक्षा आयोग' के संबंध में विचार प्रस्तुत किए सन 1930 में कांग्रेस ने पूर्ण स्वतंत्रता का प्रस्ताव पास किया और स्वतंत्रता की प्राप्ति के लिए गांधी जी ने 'असहयोग आंदोलन' प्रारंभ किया यह आंदोलन काफी उग्र हो गया और ब्रिटिश सरकार को गांधी के साथ समझौता करना पड़ा यह समझौता 6 मार्च सन 1931 को हुआ जो 'गांधी इरविन समझौता' के नाम से प्रसिद्ध हुआ इस समझौते के बावजूद अंग्रेजों ने अपनी दमनात्मक नीति को नहीं छोड़ा जिसके परिणामस्वरूप सन 1942 में 'भारत छोड़ो' आंदोलन की आग भड़क उठी देश में क्रांति हुई महात्मा गांधी सहित तमाम स्वतंत्रता सेनानी जेल में बंद कर दिए गए धीरे-धीरे परिस्थितियों में कुछ सुधार आया और सन 1944 में सभी को जेल से मुक्त कर दिया गया 15 अगस्त सन 1947 के दिन भारत को पूर्ण स्वतंत्रता प्राप्त हुई स्वतंत्रता के साथी साथ देश का विभाजन हुआ सांप्रदायिक झगड़े उठ खड़े हुए उनकी सांप्रदायिक नीति से असंतुष्ट होकर एक संकीर्ण मन वाले युवक नाथूराम गोडसे ने शुक्रवार के दिन 30 जनवरी सन 1948 को उन्हें अपनी गोली का शिकार बनाया उसी क्षण् विश्व की महान विभूति पंचतत्व में विलीन हो गई।





शिक्षा का अर्थ (Meaning Of Education)


गांधीजी ने साक्षरता या लिखने पढ़ने के साधारण ज्ञान को शिक्षा नहीं माना उनके विचार से "साक्षरता ना तो शिक्षा का अंत है और न शिक्षा का प्रारंभ यह तो केवल स्त्री पुरुष को शिक्षित करने का एक साधन है"
गांधीजी के अनुसार शिक्षा का रूप अत्यंत व्यापक एवं विस्तृत है शिक्षा बालक में सभी प्रकार की क्षमताओं का विकास करती है गांधी जी ने स्पष्ट रूप से व्यक्त किया है कि "सच्ची शिक्षा वह है जो बालकों की आत्मिक बौद्धिक और शारीरिक क्षमताओं को अपने अंदर से बाहर प्रकट एवं उत्तेजित करती है"
इस प्रकार गांधीजी शिक्षा का अर्थ शरीर बुद्धि भावना और आत्मा के पूर्ण विकास को मानते हैं अर्थ अर्थ व्यक्ति का शारीरिक मानसिक और आत्मिक विकास हो सके।

शिक्षा के उद्देश्य गांधी जी ने शिक्षा को विभिन्न समयो में विभिन्न दृष्टिकोण से देखा समय-समय पर शिक्षा के अनेक उद्देश्य बताएं गांधी जी ने उद्देश्यों को दो भागों में विभाजित किया है तात्कालिक व अंतिम उद्देश्य।

(I)तात्कालिक उद्देश्य– इसके अंतर्गत गांधीजी ने उन उद्देश्यों को रखा है जिनसे विद्यार्थी को तुरंत लाभ हो सके
गांधी जी की शिक्षा के तात्कालिक उद्देश्य निम्नलिखित हैं

1.शारीरिक विकास– मानव को अपने जीवन में किसी भी उद्देश्य की प्राप्ति तभी संभव हो सकती है जब उसका शारीरिक विकास ठीक प्रकार से हो

2.नैतिक अथवा चरित्रिक विकास– शिक्षा के उद्देश्य के विषय में बताते हुए गांधीजी ने अपनी आत्मकथा में लिखा है "मैंने सदर हृदय की संस्कृति अथवा चरित्र निर्माण को प्रथम स्थान दिया है तथा चरित्र निर्माण को शिक्षा का उचित आधार माना है"

3.मानसिक एवं बौद्धिक विकास– गांधीजी के अनुसार शरीर के साथ-साथ मन एवं बुद्धि का विकास करना भी शिक्षा का प्रमुख उद्देश्य हैं

4.जीविकोपार्जन का उद्देश्य– गांधीजी के अनुसार "शिक्षा को बेरोजगारी के विरुद्ध एक बीमा होना चाहिए"
शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को आजीविका उपार्जन के योग्य बनाना है जिससे वह आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हो सके

5.सांस्कृतिक उद्देश्य– गांधी जी का कहना था कि मैं इस शिक्षा के साहित्यिक पक्ष के स्थान पर सांस्कृतिक पक्ष को अधिक महत्व देता हूं संस्कृति शिक्षा का आधार तथा विशेष अंग है अतः मानव के प्रत्येक व्यवहार पर संस्कृति की छाप होनी चाहिए

6.पूर्ण विकास का उद्देश्य– गांधीजी के अनुसार "शिक्षा से मेरा तात्पर्य उस प्रक्रिया से है जो बालक और मनुष्य के शरीर, मन तथा आत्मा का उत्कृष्ट एवं सर्वांगीण विकास करें"

7.मुक्ति का उद्देश्य– 'सा विद्या या विमुक्तये' गांधीजी के आदर्श के अनुसार शिक्षा का उद्देश्य व्यक्ति को सांसारिक बंधनों से मुक्त मुक्ति दिलाना है और उसकी आत्मा को उन्नत जीवन की ओर ले जाना है गांधीजी शिक्षा के द्वारा व्यक्ति को आध्यात्मिक स्वतंत्रता देना चाहते थे

(II)अंतिम उद्देश्य– गांधीजी का चरम उद्देश्य वास्तविकता का अनुभव ईश्वर एवं आत्मज्ञान मानते थे इस उद्देश्य की पूर्ति के लिए उन्होंने चरित्र निर्माण को आवश्यक माना।






 वर्धा योजना (Wardha Scheme)


अंग्रेजों की द्वैध शासन प्रणाली से भारतीय संतुष्ट नहीं थे उसकी समाप्ति की मांग कर रहे थे समय की नब्ज पहचानते हुए ब्रिटिश सांसद ने 1935 में 'भारत सरकार अधिनियम' पास किया। यह अधिनियम 1937 में लागू हुआ इस अधिनियम में भारत में द्वैध शासन की समाप्ति हुई और प्रांतों में स्वशासन स्थापित हुआ उस समय भारत 11 प्रांतों में विभाजित था इन 11 प्रांतों में से 7 प्रांतों में कांग्रेस मंत्रिमंडल बने और एक नए युग की शुरुआत हुई
उस समय राष्ट्र का नेतृत्व गांधी जी के हाथों में था उन्होंने 11 अगस्त 1937 के अखबार में प्रांतीय सरकारों को 7 से 14 वर्ष के बच्चों की शिक्षा का भार अपने ऊपर लाने का सुझाव दिया उसके बाद उन्होंने 2 अक्टूबर 1937 के 'हरिजन' में लिखा कि प्राथमिक शिक्षा 7 वर्ष या इससे अधिक समय की हो और इसमें अंग्रेजी को छोड़कर सभी से पढ़ाई जाएं जिन्हें मैट्रिकुलेशन परीक्षा के लिए पढ़ाया जाए साथ ही किसी हस्तशिल्प अथवा उद्योग को अनिवार्य रूप से पढ़ाया व सिखाया जाए गांधीजी के इन विचारों से देश में एक नई क्रांति का शुभारंभ हुआ

अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन, वर्धा 


23 अक्टूबर 1937 को वर्धा में 'मारवाड़ी शिक्षा मंडल' की रजत जयंती मनाई जाने वाली थी श्रीमन्नारायण अग्रवाल इसके आयोजक थे गांधीजी ने उन्हें इस अवसर पर एक शिक्षा सम्मेलन का आयोजन करने का सुझाव दिया अग्रवाल साहब ने इस अवसर पर भारत को सातों कांग्रेस मंत्रिमंडल के शिक्षा मंत्रियों और देश के चोटी के शिक्षाशास्त्रियों, विचारकों और राष्ट्रीय नेताओं को आमंत्रित किया और 'अखिल भारतीय राष्ट्रीय शिक्षा सम्मेलन' का आयोजन हुआ इस से 'वर्धा शिक्षा सम्मेलन' भी कहा जाता है इस सम्मेलन का सभापति सभापतित्व स्वयं गांधी जी ने किया।

 बेसिक शिक्षा (Basic Education)


डॉ जाकिर हुसैन द्वारा प्रस्तुत रिपोर्ट जो बेसिक शिक्षा हरिपुर कांग्रेस अधिवेशन में स्वीकार की गई आगे उसका क्रमबद्ध वर्णन प्रस्तुत है

बेसिक शिक्षा की रूपरेखा


  1. 7 से 14 वर्ष आयु के सभी बच्चे के लिए अनिवार्य एवं निशुल्क प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था की जाए 
  2. शिक्षा का माध्यम मातृभाषा को संपूर्ण शिक्षा किसी आधारभूत सिर्फ अथवा उद्योग पर आधारित हो 
  3. शिल्प का चुनाव बच्चों की योग्यता और क्षेत्रीय आवश्यकता के आधार पर किया जाए 
  4. बच्चों द्वारा निर्मित वस्तुओं का उपयोग हो और उनसे आर्थिक लाभ लिया जाए, स्कूलों का व्यय पूरा किया जाए 
  5. शिल्पों की शिक्षा इस प्रकार दी जाएगी उससे बच्चे जीविकोपार्जन कर सकें 
  6. शिल्पो की शिक्षा में आर्थिक महत्व के साथ-साथ उसके सामाजिक एवं वैज्ञानिक महत्व को भी स्थान दिया जाए 


बेसिक शिक्षा के सिद्धांत (Principles of Basic Education)


बेसिक शिक्षा निम्नलिखित आधारभूत सिद्धांतों पर विकसित की गई थी

1.शिक्षा को अनिवार्य एवं निशुल्क बनाने का सिद्धांत– गांधीजी शिक्षा को मनुष्य का जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं उन्होंने स्पष्ट घोषित किया कि किसी भी बच्चे को शिक्षा के अधिकार से वंचित रखना उसके अधिकार का हनन है यह कार्य असत्य है और मानवीय कसौटी पर हिंसा है उन्होंने सर्वप्रथम इस बात पर बल दिया कि राज्य को 7 से 14 वर्ष के सभी बच्चों के लिए अनिवार्य एवं निशुल्क प्राथमिक शिक्षा की व्यवस्था करनी चाहिए

2.शिक्षा को आत्मनिर्भर बनाने का सिद्धांत– गांधीजी के सामने सर्वभौमिक, अनिवार्य और निशुल्क प्राथमिक शिक्षा का प्रश्न था और उस समय राज्य के पास इसकी व्यवस्था करने के साधन नहीं थे अतः उन्होंने स्कूल में हस्तशिल्पों की शिक्षा अनिवार्य करने पर बल दिया उनका अनुमान था कि बच्चों द्वारा उत्पादित वस्तुओं से स्कूल काव्य निकल सकेगा

3.सत्य, अहिंसा और सर्वोदय का सिद्धांत– गांधी जी सत्य और अहिंसा के पुजारी थे वे समाज में होने वाले किसी भी प्रकार के शोषण को हिंसा मानते थे और उस समय अंग्रेजी शिक्षा प्राप्त व्यक्ति सामान्य व्यक्तियों का शोषण कर रहे थे तभी गांधीजी ने सबके लिए समान शिक्षा के सिद्धांत को स्वीकार किया इसमें छोटे बड़े का भेद नहीं होगा कोई किसी का शोषण नहीं करेगा सब को अपने उत्थान के समान अवसर प्राप्त होंगे

4.शिक्षा को जीवन से जोड़ने का सिद्धांत– उसी समय अंग्रेजी शिक्षा का भारतीयों के वास्तविक जीवन से कोई संबंध नहीं था गांधी जी ने शिक्षा को बच्चों के वास्तविक जीवन उनके प्राकृतिक एवं सामाजिक पर्यावरण और पहलू एवं क्षेत्रीय उद्योग धंधों पर आधारित कर उसे उनके वास्तविक जीवन से जोड़ने पर बल दिया

5.शिक्षा का माध्यम मातृभाषा बनाने का सिद्धांत– गांधी जी ने स्पष्ट किया कि मातृभाषा पर बच्चों का स्वाभाविक अधिकार होता है उसी के माध्यम से जन शिक्षा की व्यवस्था की जा सकती है यही कारण है कि बेसिक शिक्षा में अभिव्यक्ति के आधारभूत माध्यम मातृभाषा को शिक्षा का माध्यम बनाने का सिद्धांत स्वीकार किया गया

6.शिक्षा को हस्त कौशल पर केंद्रित करने का सिद्धांत– शिक्षा को किसी हस्त कौशल अथवा उद्योग पर केंद्रित करने के पीछे गांधीजी के कई विचार थे पहला यह कि वे बच्चों को कायिक श्रम का महत्व बताना चाहते थे दूसरा यह कि वे बच्चों को स्वावलंबी बनाना चाहते थे उन्हें जीविकोपार्जन करने योग्य बनाना चाहते थे तीसरा यह कि वह सब का उदय करना चाहते थे चौथ यह कि वे शिक्षा को गांव के जीवन से जोड़ना चाहते थे और पांचवा शिक्षा को आत्मनिर्भर बनाना चाहते थे स्कूलों में होने वाले उत्पादन से स्कूलों काव्य निकलना चाहते थे

7.ज्ञान को एक इकाई के रूप में विकसित करने का सिद्धांत– यदि भौतिक दृष्टि से देखा देखें तो शिक्षा का एक ही लक्ष्य होता है– मनुष्य को वास्तविक जीवन के लिए तैयार करना तब पाठ्यचर्या के समस्त विषयों एवं क्रियाओं का संबंध मनुष्य के वास्तविक जीवन से होना चाहिए इसी दृष्टि से गांधी जी ने ज्ञान को पूर्ण इकाई के रूप में विकसित करने पर बल दिया था इसी विचार ने शिक्षण की सहसंबंध विधि को जन्म दिया।

 बेसिक शिक्षा के उद्देश्य (Aims of Basic Education)


1.शारीरिक एवं मानसिक विकास– गांधीजी इस तथ्य से अवगत थे कि मनुष्य एक मनोशारीरिक प्राणी है इसलिए उन्होंने सर्वप्रथम उसके शारीरिक एवं मानसिक विकास पर बल दिया

2.सर्वोदय समाज की स्थापना– मनुष्य एक सामाजिक प्राणी है तथा शिक्षा द्वारा मनुष्य का सामाजिक विकास होना चाहिए परंतु गांधी जी का सामाजिक विकास से एक विशिष्ट अर्थ था वे एक ऐसे समाज का निर्माण करना चाहते थे जिसमें कोई किसी का शोषण नहीं करें सब एक दूसरे से प्रेम करेंगे सब एक दूसरे का सहयोग करेंगे सब एक दूसरे की उन्नति में सहायक बनेंगे

3.सांस्कृतिक विकास– उस काल में उच्च वर्ग के भारतीय पाश्चात्य संस्कृति के प्रशंसक होते थे होते जा रहे थे तब गांधी जी ने बड़े बलपूर्वक लिखा था कि यदि किसी स्थिति में पहुंचकर कोई पीढ़ी अपने पूर्वजों के प्रयासों से पूर्णतया अनभिज्ञ हो जाती है या उसे अपनी संस्कृति पर लज्जा जाने लगती है तो वह नष्ट हो जाती है इसीलिए उन्होंने अपनी भारतीय संस्कृति की रक्षा के लिए बेसिक शिक्षा का विधान किया था

4.चरित्रिक एवं नैतिक विकास– गांधीजी चरित्र बल के महत्व को जानते थे उन्हें उनके साथियों ने भी शिक्षा द्वारा बालकों के चरित्र निर्माण पर बल दिया

5.व्यवसायिक विकास– गांधी जी ने इस संबंध में दो बातें कहीं

  • बच्चों को जो भी हस्तकौशल सिखाये जायें उसे स्कूल में इतना उत्पादन हो कि इसके विक्रय लाभ से स्कूल काव्य निकाला जा सके 
  • इन हस्तकौशलों अथवा उद्योगों को सीखने के बाद बच्चे अपनी जीविका कमा सकें 


6.नागरिकता का विकास– राष्ट्र की दृष्टि से व्यक्ति नागरिक कहा जाता है किसी भी राष्ट्र के नागरिकों के लिए आवश्यक है कि वे राष्ट्र के नियमों का पालन करें किसी भी राष्ट्रीय शिक्षा प्रणाली का प्रमुख उद्देश्य है बेसिक शिक्षा एक राष्ट्रीय शिक्षा योजना है इसका यह उद्देश्य होना स्वाभाविक है

7.आध्यात्मिक विकास– गांधीजी शिक्षा द्वारा मनुष्य का आध्यात्मिक विकास भी चाहते थे परंतु इसके लिए वे किसी धर्म की शिक्षा दिए जाने के पक्ष में नहीं थे वे सर्वधर्म समभाव द्वारा इसकी प्राप्ति पर बल देते थे





गांधीजी के अनुसार शिक्षा का पाठ्यक्रम (Curriculum According to Gandhiji)


पाठ्यक्रम के निर्धारण में गांधीजी ने निम्नलिखित सिद्धांतों को ध्यान में रखा―

1.उपयोगिता का सिद्धांत– गांधीजी वर्तमान शिक्षा से संतुष्ट नहीं थे क्योंकि इस शिक्षा को वे बालक के जीवन में उपयोगिता की दृष्टि से निरर्थक ही नहीं वरन हानिकारक भी समझते थे उनके मतानुसार यह शिक्षा व्यर्थ है क्योंकि यह बालक को आदर्श नागरिक बनाने की अपेक्षा उसे आदर्श नागरिक के गुणों से दूर ले जाती है छात्र अपने पारिवारिक वातावरण से दूर हो जाते हैं और फिर भी अपने घरेलू काम धंधे को उपेक्षा अथवा हीन दृष्टि से देखते हैं वे सादे और उच्च विचार वाले ग्रामीण जीवन के स्थान पर नगर की आधुनिकतम बुराइयों से भरी जिंदगी में रंग जाते हैं और विभिन्न प्रकार की गंदगी और बुराइयों के शिकार हो जाते हैं

2.सहसंबंध का सिद्धांत– गांधीजी का विचार था कि समस्त पाठ्य विषयों की शिक्षा संबंधित ढंग से दी जाए अर्थात एक विषय का ज्ञान प्रदान करते समय अन्य विषय अन्य प्रासंगिक विषयों की शिक्षा दी जानी चाहिए इसीलिए उन्होंने हस्तकला को पाठ्यक्रम का केंद्र बनाया

3.लचीलेपन का सिद्धांत– गांधीजी ने पाठ्यक्रम के निर्धारण में लचीलापन के सिद्धांत का भी ध्यान रखा उनकी बेसिक शिक्षा योजना में बालकों को अपनी रुचि के अनुसार किसी भी हस्तकला चुनने की स्वतंत्रता थी पाठ्यक्रम में अनेक हस्तकलाएँ और विषय सम्मिलित हैं यह विषय निम्नलिखित हैं―

(I)हस्तकलाएँ– कताई बुनाई, दफ़्ती, कृषि, बागवानी, कागज, लकड़ी, चमड़ा, मिट्टी आदि का काम ।
(II)भाषा– मातृभाषा, राष्ट्रभाषा, हिंदुस्तानी भाषा
(III)गणित– रेखागणित, अंकगणित, नाप खोज
(IV)सामाजिक अध्ययन– इतिहास, भूगोल, अर्थशास्त्र और नागरिक शास्त्र का सम्मिलित पाठ्यक्रम
(V)सामान्य विज्ञान– वनस्पति विज्ञान, जीव विज्ञान, प्रकृति अध्ययन, रसायन विज्ञान तथा स्वास्थ्य विज्ञान, गृह विज्ञान (केवल बालिकाओं के लिए)
(VI)ललित कलाएं– संगीत, चित्रकला
(VII)शरीर शिक्षा– व्यायाम, खेलकूद, ड्रिल
(VIII)नैतिक और धार्मिक शिक्षा– प्रतिदिन प्रार्थना, समाज सेवा कार्य तथा उपदेश।

शिक्षण विधि (Teaching Method)


गांधी जी द्वारा प्रतिपादित शिक्षण विधियां निम्नलिखित हैं

  1. सक्रिय विधि 
  2. निरीक्षण विधि 
  3. प्रयोग विधि 
  4. अनुसंधान/स्वाध्याय विधि 
  5. क्रियाविधि सहयोग विधि 
  6. मौखिक विधि 
  7. चिंतन एवं मनन विधि 
  8. संगीत विधि

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