उपनिवेशी, स्वतंत्र व उपनिवेश-पश्चीय कालीन शिक्षा

 उपनिवेशी कालीन शिक्षा (Colonial Period Education)





यह काल अंग्रेजी शिक्षा प्रणाली का भारत में प्रवेश का काल कहा जाता था इस काल में भारतीय शिक्षा दर्शन के स्थान पर पाश्चात्य शिक्षा दर्शन पर बल दिया गया उपनिवेशी काल में भारतीय शिक्षा दर्शन इन संप्रदायों द्वारा प्रतिपादित शिक्षा संबंधी धारणाओं से ही प्रेरित होता रहा है
उपनिवेश काल में ईसाई धर्म के दर्शन का भी शिक्षा पर प्रभाव पड़ा जब अंग्रेज भारत आए तो वह अपने साथ अपने पादरियों को भी लाए उन्होंने भारतीय समाज की दुर्दशा को देखा और यह समझा कि यहां शिक्षा की अत्यंत आवश्यकता है उन्होंने विभिन्न स्तरों के विद्यालय स्थापित किए और दों लक्ष्यों को सामने रखकर शिक्षा की रूपरेखा बनाई एक तो समाज के उत्थान का लक्ष्य था तो दूसरा ईसाई धर्म के प्रचार का। ईसाई धर्म के शिक्षा दर्शन में मानव सेवा, प्रेम, आत्म त्याग, दया तथा ईश्वर भक्ति शामिल थी अतः भारतीय शिक्षा में इन आदर्शों को महत्वपूर्ण स्थान दिया गया



इस काल में शिक्षा दर्शन के संबंध में एक और चेतना जागृत हुई कुछ प्रगतिशील भारतीयों ने पाश्चात्य शिक्षा के महत्व को समाज के उत्थान के लिए पहचाना और उन्होंने इसको अपनाने पर जोर दिया इनमें राजा राममोहन राय तथा सर सैयद अहमद खान का नाम विशेष रूप से लिया जाता है कुछ भारतीयों ने भारतीय और अंग्रेजी शिक्षा के सम्मिश्रण पर बल दिया इस काल के प्रमुख भारतीय चिंतक जिन्होंने शिक्षा के संबंध में अपने दृष्टिकोण को प्रसारित किया उनमें से कुछ हैं― स्वामी दयानंद, विवेकानंद, रामकृष्ण परमहंस आदि इन्होंने पाश्चात्य शिक्षा के गुणों को समझा और पाश्चात्य वैज्ञानिक दृष्टिकोण को पूर्वी दर्शन के साथ मिश्रित करने की चेष्टा की
बीसवीं सदी के प्रारंभ में जिन चिंतकों ने भारतीय शिक्षा दर्शन के विकास में योगदान दिया उनमें से प्रमुख थे― बाल गंगाधर तिलक, रविंद्र नाथ टैगोर, महात्मा गांधी, श्री अरविंद आदि बीसवीं सदी के भारतीय दार्शनिक उपनिषद् तथा गीता के उपदेशों से बहुत प्रभावित हुए थे शिक्षा को इन्होंने व्यक्ति की मनोभौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति का साधन तथा परम आनंद प्राप्त करने की प्रक्रिया माना। बाल गंगाधर तिलक का विश्वास था कि हम इच्छाओं का पूर्ण बहिष्कार नहीं कर सकते हम तो अपनी इच्छाओं का तर्क द्वारा नियंत्रण खोज सकते हैं।






स्वतंत्रता काल शिक्षा (Independent Period Education)


भारतीय संविधान 26 जनवरी, सन् 1950 को ग्रहण किया गया यह ऐसा दस्तावेज था जिसने भारतीय नागरिक की छवि को स्वतंत्र संसार के सम्मुख प्रस्तुत किया संविधान की प्रस्तावना में ही भविष्य में भारतीय समाज का रूप क्या होगा इसकी ओर आदर्श प्रस्तुत किए गए हैं इसमें नागरिक के मूल अधिकारों का वर्णन किया गया है जो है स्वतंत्रता, समानता, बंधुत्व तथा न्याय। संविधान में जो भारतीय नागरिक की छवि प्रस्तुत की गई है वह है एक ऐसा व्यक्ति जो अपनी स्वतंत्रता से प्रेम करता है कानून को मानता है और नियमों का पालन करता है समानता में विश्वास रखता है और मानव कल्याण की ओर सक्रिय रहता है।
भारतीय शिक्षा दर्शन जो प्रारंभिक स्वतंत्रता काल में विकसित हुआ उसमें विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग जो सन् 1949 में डॉक्टर राधाकृष्णन की अध्यक्षता में नियुक्त हुआ था उसका बहुत योगदान है इसने विश्वविद्यालय शिक्षा के उद्देश्य के संबंध में सिफारिश की कि शिक्षा चरित्र निर्माण के लिए दी जानी चाहिए एक शिक्षित व्यक्ति अध्यात्मिक होना चाहिए शिक्षा आत्मा को उन्नति की ओर ले जाने वाली होनी चाहिए शिक्षा दर्शन में यह विचारधारा आदर्शवाद के निकट मानी जाती है यह शिक्षा की धारणा जो मानव के जीवन में सबसे उत्तम है उसकी ओर ही ध्यान आकर्षित करती है यह इस बात पर बल देती है कि एक शिक्षित व्यक्ति वह होगा जिसने अपनी इच्छाओं और आवेगो पर नियंत्रण कर लिया है।




राधाकृष्णन आयोग द्वारा प्रतिपादित शिक्षा की धारणा अत्यंत सम्यक् एवं वांछित थी किंतु इसने देश की शैक्षिक सीन में कोई विशेष परिवर्तन नहीं लाया शिक्षा के परिवेश में भ्रम ही फैला रहा सन् 1964 में एक अन्य आयोग का गठन कोठारी महोदय की अध्यक्षता में हुआ इसने सन 1966 में अपनी रिपोर्ट दी इसमें यह बताया गया कि सामाजिक परिवर्तन का सबसे महत्वपूर्ण यंत्र शिक्षा ही है इसने भारतीय समाज के लिए शिक्षा का व्यवहारिक मॉडल प्रस्तुत किया देश की दरिद्रता को ध्यान में रखते हुए इसने शिक्षा के उद्देश्य में उत्पादन को सबसे महत्वपूर्ण स्थान दिया इस अयोग्य ने आयोग ने वैज्ञानिक दृष्टिकोण के विकास, जनतंत्रिक जीवन में निष्ठा, नैतिक चरित्र तथा राष्ट्रीय एकता के लिए शिक्षा पर बल दिया
इस कमेटी के पश्चात सन् 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति बनाई गई जिसने फिर एक शिक्षा की रूपरेखा प्रस्तुत की किंतु दार्शनिक दृष्टिकोण से इसमें कोई नवीन अवधारणा प्रस्तुत नहीं की गई इसका मुख्य लक्ष्य शिक्षा में पुनर्संगठन पर था  कोठारी कमीशन द्वारा प्रतिपादित शिक्षा के उद्देश्य में इसने कोई विशेष फेरबदल नहीं किया इस नीति के पुनर्विलोकन के लिए एक कमेटी आचार्य राममूर्ति की अध्यक्षता में बनाई गई इस कमेटी ने ऐसी शिक्षा की धारणा प्रस्तुत की जो व्यक्ति को रूढ़ि युक्तियों के बंधन से मुक्त कर सके और नवीन विचार को ग्रहण करने की क्षमता प्रदान करें तथा व्यक्ति अपने विचारों को बिना भय के प्रस्तुत कर सके। शिक्षा एक स्वतंत्रता प्रदान अनुभव होना चाहिए यह एक स्वतंत्रता प्रदान करने का यंत्र होना चाहिए सच्ची शिक्षा द्वारा व्यक्ति में मानवता का विकास होना चाहिए।

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